मैं एक पन्नी हूँ और भटक रही हूँ यहाँ से वहाँ,

वैसे ही जैसे मेरे ‘प्लास्टिक’ परिवार के बाकी सदस्य,

फ़ैल रहे है  डगर-डगर और भटक रहे हैं नगर-नगर,

सह रहीं हूँ  मैं लोगों कि बेदर्दी जो मुझे देखके मुंह फेर लेते हैं,

कोई आए, उठाये मुझे, और ले जाए मुझे मेरे सही मक़ाम तक,

मुझे भी कोई गले से लगाये और प्यार से पूछे के ‘तेरा हाल क्या है’

मेरे और भी भाई-बहन हैं जो मेरी तरह ही दर दर कि ठोकरें खा रहें हैं,

कल ‘पीवीसी’(PVC)  सुना रहा था अपनी दर्द भरी दास्तान,

क्यूं नहीं बचाते लोग मुझसे अपनी जान,

क्या अपने बच्चों की और भविष्य कि भी चिंता नहीं हैं इंसान को,

जो हमें सहेज कर,  कर दे अलग, और रखे साफ़ अपने घर-परिसर,

कितनी निर्दयता से लोग हमें मिला देते हैं एक दूसरे के साथ,

कभी मैं काँटों में फस जाऊं , कभी किसी पेड़ कि टहनी से लिपट जाऊं,

कभी नालों में बह जाऊं और अटक जाऊं किसी ‘डिब्बे’ या ‘पीपे’ के मुहाने पे,

कभी पानी पे तैरती रहूँ यूँही और बन जाऊं कारण गन्दगी का,

या फिर सडती रहूँ नदी-ताल-तलैया की सतह पर और प्रदूषित कर दूं सब जल,

आज कल तो आप जहां भी देखोगे मुझे हर जगह पर पाओगे ,

खेत-खालिहनोंमें-अपने आसपास के परिसर में, अत्र-तत्र-सर्वत्र- मैं ही मैं हूँ,

यूँही उड़ते-फिरते, गिरते-पड़ते कट रहा हैं सफर – मंजिल की नहीं खबर,

मुझे अपना लो, मुझे चाहो – मुझे समझो, मुझसे प्यार करो,

पहुंचा कर मुझे मेरे ‘मोक्ष’ तक, बचालो अपनी ‘वसुंधरा’ को,

कर रक्षण ‘पर्यावरण’ का, निभाओ ‘फ़र्ज़’ अपने ‘इंसान’ होने का !

(… जिन्हें नाज़ हैं ‘संसद’ पर वो कहाँ है,)
हमने देखा कि अन्ना के आंदोलन के दौरान पिछले कुछ दिनों में अचानक ‘संसद’ के प्रति कुछ लोगों का प्यार उमड़ आया . संसद कि गरिमा , संसदीय व्यवस्था ,इत्यादि के प्रति कुछ लोग जागरूक हो गए हैं. इनमें कुछ उच्च पदस्थ लोग जैसे की पूर्व न्यायाधीश भी शामील हैं.
यहाँ मैं एक चीज़ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि संसद के प्रति हर भारतीय कि निष्ठा और खासकर  सामान्य जनता कि निष्ठा, विश्वास, एवं ‘भारतीय संसद’ का अभिमान किसी भी नेता या ‘मौकापरस्त’ और ‘स्वार्थी’ लोगों से से ज्यादा ही है.
हमारी संसदीय व्यवस्था पर हमें नाज़ हैं, हमारे देश के ‘संविधान’ जैसा ‘संविधान’ शायद ही दुनिया में किसी देश का हो. हमारे ‘संघीय’ ढांचे पर भी हमें गर्व है.
और इसीलिए जब कभी भी हमारी ‘संसद’, ‘संसदीय’ व्यवस्था या फिर हमारे ‘संघीय ढांचे’ का अपमान होता हो या इसकी गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले कार्य होते हो तो हमें इसका कड़े से कड़े शब्दों में विरोध तो करना ही चाहिए एवं इसकी रक्षा के लिए भी आगे आना चाहिए.
तो इन अचानक जागृत हुए सभी महानुभावोंसे मैं पूछना चाहतां हूँ कि ‘संसद’ के ऊपर हमले के आरोपी अभी भी सजा से वंचित क्यों है. जो लोग संसद पर हुए हमले में शहीद हुए थे उनके घरवालों कि क्या आपने कभी सुध ली? शहीदों के रिश्तेदारों को आवंटित किये गए पेट्रोल पम्प तक में घोटाले हुए या उनसे हड़पने कि कोशिशे हुई, उस समय आपने कुछ किया?
या तो फिर जब संसद में हमारे सम्मानीय सांसद बार बार गैर हाजिर होते है, महत्वपूर्ण मुद्दों कि चर्चा के समय सोतें हैं, बिना कारण ‘वाक आउट’ करतें है, जनता कि गाढ़ी कमाई का करोड़ों रूपया पानी कि तरह जब बहाया जाता हैं, तब आप क्या करते हैं? तब संसद कि ‘गरिमा’, इसकी ‘पवित्रता’ का आपको स्मरण नहीं होता है क्या जनाब?
देश में कई लोगों को एक समय का भर पेट भोजन तक नहीं मिलता हैं और हमारे सांसद ‘रिआयती’ दरों पर संसद कि कैंटीन में ‘लज़ीज़’ खाना उड़ाते हैं. तब आप विरोध प्रकट क्यों नहीं करते?
वैसे तो किसी भी ‘राष्ट्रहित’ या ‘सामान्य जनता’ के हितों के मुद्दों पर हमारे सांसदों में ‘एकता’ नहीं होती पर खुद के भत्तों कि बढ़ोतरी के समय सब सांसद इस पर मुहर लगाने के लिए अभूतपूर्व (!) ‘एकता’ का प्रदर्शन करते हैं, कैसे?
जब सांसद ‘संसद’ में ‘अभद्र’ भाषा का प्रयोग करते हैं, ‘रुपयें’ उछालते है, ‘धींगा-मुश्ती’ करते हैं, और देश का ‘बेशकीमती’ समय बर्बाद करतें हैं, तब ‘संसद’ और ‘संसदीय व्यवस्था’ कि ‘गरिमा’ का आपको विचार आता है?
क्या तब आपको ‘संसद’ के ‘सम्मान’, इसके ‘अस्तित्व’ कि याद आती है, इसके ‘पावित्र्य’ का ख्याल आता है?
कई साल पहले साहिर कि लिखी हुई पंक्तियाँ मुझे याद आती है .. ‘जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ है?’
इसी तर्ज़ पर संसद के मान –सम्मान से जुडी कुछ बातें मेरे जेहन में आयी..कविता के रूप में;

.. हैं सजा से दूर संसद के हमलावर अभी भी,हैं बर्दाश्त हमको मुंबई के कातिल भी देखो, और शहीदों के परिवार की मुश्किलों को तो समझो,जिन्हें नाज़ हैं संसद पर वो कहाँ हैं .. कहाँ है..कहाँ है?
ज़रा इन सांसदों के बंगले तो देखो, इनकी ऐशो-आरामी के साधन भी देखो, और हमारे बेबस किसानों की लाचारी को समझो, जरा इनकी हालत पर कुछ तरस तो खाओ … जिन्हें नाज़ हैं संसद पर वो कहाँ है?,
जब संसद में उछले थे नोटों के बन्डल, लगी ठेस दिल को हुए हम थे घायल, यह मुद्दों पे शोरगुल -सदस्यों का दंगल, जिन्हें नाज़ हैं संसद पर वो कहाँ है, कहाँ है,

… जरा संसद के रहबरों को बुलाओ, यह नए-नए घोटालों कि फेहरिस्त दिखाओ, कैसे-कैसे लूटें वोह पब्लिक के पैसे बताओ, जिन्हें नाज़ है संसद पर उनको लाओ, …. कहाँ है,  कहाँ है,  कहाँ है!

(लोकतंत्र का ‘अमृत-मंथन’ और ‘नीलकंठ’ अन्ना)
●अन्ना के आंदोलन ने देश में एक भूचाल सा ला दिया है, देश में एक नयी लहर और नव- चेतना का संचार हुआ है. बरसों की निकम्मी व्यवस्था को उखाड फेंकने के लिए देशवासी सुसज्ज हो गए हैं. यह एक अच्छी शुरूवात है. और सबसे बड़ी बात है की लोग इस देश को ‘अपना देश’ मानने लगे है! अपने घर में फैली हुई ‘गन्दगी’ को हमें ही साफ़ करना पड़ेगा, हम खुद करेंगे तो ‘सफाई’ और भी ‘दिल-से’ और ‘अच्छी’ होगी, दूसरे के भरोसे रहेंगे तो ‘संतुष्टि’ नहीं मिलेगी.
●७४ वर्ष के अन्ना के साथ जब पूरा देश खड़ा है, तब , नयी पीढ़ी – हमारे युवाओं का इस आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेना देश को एक नयी दिशा प्रदान करता है और आने वाले दिनों हमारे सांस्कृतिक,सामाजिक, और सार्वजनिक जीवन में एक ‘परिवर्तन’ का संकेत भी देता है. असल में यह एक लंबे संघर्ष की शुरुवात भर है. अभी और बहोत समस्याएं हैं जिनका समाधान होना बाकी है.
●ताज्जुब की बात है कि ‘कांग्रेस’ जैसी सबसे ‘पूरानी’ पार्टी ‘जन-लोकपाल’ के इस मुद्दे को समर्थन देने में पीछे क्यों रह गयी या हिचकिचाहट किस चीज़ की और क्यों है. मैं तो कहता हूँ कि मनमोहन सिंह जैसे हमारे सम्माननीय प्रधानमंत्री को ही सबसे पहले इस ‘जन-लोकपाल बिल’ का समर्थन करना चाहिए और अन्ना के साथ अनशन पर बैठकर इसे लागू करना चाहिए. मैं प्रधानमंत्री जी का आह्वान करता हूँ कि अपनी ‘अंतरात्मा’ आवाज़ को सुने और देश के हित में इस ‘जन-लोकपाल बिल’ को लाकर एक नया इतिहास बनाये.
दलीय राजनीती से ऊपर उठ कर सभी सांसदों से भी अनुरोध हैं कि वे अन्ना कि लड़ाई में शामिल होकर अपना योगदान दें. और जो शामिल नहीं होते हैं ऐसे सांसद, विधायक या नेता को जनता कृपया अगले चुनाव में चुनकर नहीं लाएं, अन्यथा यह देश के साथ बहोत बड़ी ‘गद्दारी’ होगी और ‘शहीदों’ की आत्मा हमें कभी माफ नहीं करेगी.
●वैसे वर्तमान स्थिति में कई राजनीतिक पार्टियां चाहती तो अपने आपको सच्ची ‘राष्ट्रवादी’ पार्टी और जनता कि ‘सही नुमाइंदगी’ करने वाली पार्टी के रूप में अपने आपको स्थापित कर सकती थी पर उनमे ऐसी इच्छाशक्ति जागृत हो नहीं पायी. और तो और ‘भाजपा’ जैसी ‘राष्ट्रवादी’ पार्टी भी स्तिथियों का सही आकलन कर- पार्टी लाइन से ऊपर उठकर ‘भ्रष्टाचार’ को एक समग्र ‘राष्ट्रहित’ का मुद्दा बनाकर,भ्रष्टाचार विरोधी इस आंदोलन को एक प्रभावशाली नेतृत्व दे सकती थी. देश में ‘संपूर्ण क्रांति’ एवं ‘नव-निर्माण’ का वातावरण तैयार कर सकती थी. पर ऐसा नहीं कर ‘भाजपा’ ने अपने को ‘कांग्रेस’ के विकल्प के रूप में स्थापित करने का मौका भी खो दिया हैं.
●एक दो दिन पहले हमारे प्रधानमंत्रीजी ने कहा था कि लोगों को जो भी कहना है वो अपने सांसदों के मार्फ़त ही कहें, क्या हमारे प्रधानमंत्री ज़मीनी हकीकत से इतने दूर है कि, यह भी नहीं जानते कि एक बार चुनाव जीतने के बाद सांसद अपने मतदार क्षेत्र भी नहीं जाते ,लोगों से मिलना तो बहोत दूर कि बात है. वे केवल अपने चेले-चपाटों और चमचों के साथ घिरे रहते हैं और ‘भ्रष्टाचार’ के नए नए तरीके खोजने में लगे रहते हैं. ‘आम आदमी’ या उसकी समस्याओंसे  ‘सांसदों’ को कोई लेना-देना नहीं रहता. अगर सांसद अपने क्षेत्र एवं अपने लोगों की सुध लेते तो आज यह नौबत ही नहीं आती.
●कई लोगों ने अन्ना के आंदोलन का विरोध करने के बहाने ‘संसद की गरिमा’ एवं ‘संसदीय व्यवस्था’ की दुहाई दी. जिस संसद में ५४३ में से १८२ सांसद ‘दागी’ हो उस संसद की भी कोई ‘गरिमा’ है क्या?, जिन पर लूट, बलात्कार,हत्या,अपहरण,यौन शोषण जैसे अपराध दर्ज हो या इस तरह कि साजिश में शामिल होने वाले लोग संसद में हो तो संसद कि पवित्रता कैसी? कुछ लोग अपने आपको ‘बाहुबली’ या ‘दबंग’ सांसद या ‘विधायक’ कहलाने में फक्र महसूस करते हो और जिन पर ‘संगीन’ से ‘संगीन’ आरोप लग रहे हो, तो यह कैसी ‘संसदीय व्यवस्था’.
१२० करोड जनता को धत्ता बताकर पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस के दिग्विजय सिंह,अभिषेक मनु सिंघवी,प्रणब मुख़र्जी,पवन बंसल,सलमान खुर्शीद,कपिल…’कुटिल’ सिब्बल,चिदंबरम, अम्बिका सोनी तथा अन्य ने जो वैचारिक दिवालिएपन का उदहारण दिया है वह घृणास्पद हैं. साथ ही राजनीती के गिरते स्तर का द्योतक तो है ही.
●सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अन्ना के स्वास्थ्य की जिम्मेवारी किसकी है, उनके दिन-ब-दिन बिगड़ते स्वास्थ्य से अगर उनको कोई खतरा उत्पन्न होता है, तो इसकी सीधी जिम्मेवारी  हमारे देश के प्रधानमंत्री एवं ५४३ सांसदों की होगी, जिन्होंने स्थिति को इस हद तक बिगड़ने दिया. हमारे देश को अन्ना जैसे महापुरुष कि सख्त जरुरत हैं और उनके स्वास्थ्य को इस हद तक खराब करने के लिए सीधे तौर पर सरकार और विपक्ष दोनों का ही हाथ है या साजिश भी हो सकती है. क्योंकि हमारे राजनीतिज्ञ खुद का स्वार्थ छोड़ और किसी के प्रति संवदेनशील कभी रहे ही नहीं.(कुछ विरले ही अपवाद हो सकते हैं).
सत्ता का नशा कुछ इस कदर हावी हैं हमारे राजनेताओं पे कि इस देश को इन्होने अपने व्यक्तिगत ‘जागीर’ समझ रखा हैं और जनता को अपनी पैरों कि जूती. अब वक्त आ गया है कि जनता इस नाकारा व्यवस्था को ‘पटखनी’ दे और अपने खुद के चुने हुए प्रतिनिधियों को जवाबदेह बनाये और हर चीज़ का जवाब मांगे. आओ हम सब एक स्वस्थ ‘लोकतंत्र‘ कि स्थापना के लिए हमारा योगदान दें.
हमारे लोकतंत्र के इतिहास में यह ‘अमृत-मंथन’ का क्षण हैं, इसमें से क्या बहार आएगा और किसे क्या मिलेगा यह तो वक्त ही बताएगा. इसमें असली ‘देवता ‘ कौन और ‘दानव’ कौन यह पहचानना भी मुश्किल है क्योंकि कुछ परदे के भीतर हैं कुछ बाहर हैं. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण हैं की ‘विष’ प्राशन करनेवाला ‘नीलकंठ’ हमें ‘अन्ना’ के रूप में मिल गया हैं. और जरुरत इसी की हैं. क्योंकि हम में से कई बहोत कुछ चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते. फिर इतनी हिम्मत, इतना हौंसला, इतना संयम… यह सब कौन करेगा, इसीलिए हर वक्त में या कालखंड में हमें एक ‘हीरो’ की तलाश रहती हैं, जिसके पीछे हम चल सके!
और इश्वर भी अपना वचन पूरा करने और पापियों का नाश करने किसी भी रूप में अवतार ले लेते हैं. शायद इसीलिए कहते हैं की हमारा देश किसी दैवीय शक्ति के भरोसे चल रहा हैं.

Once I asked my God that,
In situations of problems-
In my sad days,
What shall I do?
Where will be my ways?

God said to me;
Problems are there
In everyone’s life,
Some moments are worse,
But moments are nice,

God told me;
Live these Moments of
Happiness forever,
You will then remember
Those worse days never,

Again I asked God;
If I am confused,
And if I lost my way,
What will I do then?
You only say,

God told smilingly;
Your life is yours lesson,
Your moments – your solutions,
Your problems- your obstacles,
Those are to be solved- by those solutions

He told me;
Problems come to everyone
But with a ‘door’ open somewhere,
It is on you to find the ‘right’ door,
Problems will leave you from there,

I asked my God;
Will you be with me?
To show me my ways,
In my problems and
In my difficult days,

He said to me;
My child, I am always with you in your difficult days,
To help you out and,
To show you the right path and ways,

Be confident always and,
And never lose your hope,
Your problems are only,
Like a long rope,
To success and hope…..

-by Scrapwala

(The Road to Development)

Travel from Mundra to Adipur-Anjar-Bhuj-Gandhidham has become very troublesome and tiresome nowadays. The condition of the roads has been in horrible condition and given the load of the traffic in this belt there is an urgent need to built good sustainable roads. The journey from Gandhidham to Mundra or Adipur to Mundra (via-Anjar) by GSRTC bus takes almost 2 hours for distance of approx 60/65 kms only and if there is a ‘tea-break’ in between the time is more than this.

Industrial development in this area has been in full swing and growing further, but this has not been supported by the infrastructural development and basic amenities for the people. People are flowing in Kutch, and during the last two-three years the numbers of migrants have grown fast. In Mundra only, many new constructions have come up and many new already in line. However, side by side there is an urgent need for developing the Infrastructure also.
Works for road repairing/ construction of new roads and construction of cause-ways has already been undertaken and going on at many locations. However to make all these sustainable is the main issue. Given the heavy traffic on these routes planning also needs to be done to by-pass the heavy motor vehicles viz.Containers, Heavy Steel Pipes, MS Steel materials and others.
Frequent and Surprise checking by RTO needs to be done very very religiously so that over speeding and rash driven vehicles are controlled and monitored, Many persons have lost life during past few days in road accidents and it compels us to think that ‘if this is really the price we should pay for’ or ‘Is life so cheap in our country’.
Speeding and unauthorized transport and drunken drivers should be strictly booked to ensure discipline and safety.
Another major issue is of providing Better sewage treatment facilities, drinking water, and waste management. Providing basic amenities to all are the basic obligations of any Government.
Even a good start can be made by providing Garbage collection facilities like bins in every residential area/street/colony and by establishing garbage disposal centers and ensuring the waste disposal plan; otherwise also pollution is increasing due to continuous industrial development in this region. Hence a long-term Environment protection plan is immediately required.
The big inflow of people has been in favour of anti-social elements and criminals who have make their shelter in Kutch. People from other states who are on the run and having criminal records in their home states have entered in construction and other job activities. The administration of Kutch needs to check and increase vigilance to get such peoples held up. ‘Kutch na aagewano’ ane khas karine Mara ‘Mundra na ‘ aagewano , let all come together and prepare a full-proof plan, because if we do not get alert today and take necessary steps we shall be only responsible to see the damage helplessly. We need to get our acts together in symphony in time now.

We all should strive for sustainable development taking into account the growing population load in this area. That needs very careful ‘town planning’ and other infrastructure also.
The political atmosphere though stable has recently been hampered by counter allegations for corruption and also group clashes among the parties. This is a bad sign for this peaceful region. All political parties should stand above their personal interests and jointly work for harmony and peace so that real overall development is achieved.
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Everyone has an aim and goal,
And has a capacity to achieve over it,
Everyone has a new idea and hope,
And has ability to make over it,

Decide up your mind,
Set up your goals,
Let your goals and dreams come true,

Follow your dream,
Turn it into action,
And then see your dream in front of you,

Believe in yourself,
Be self confident enough,
To conquer over your aim and dreams,

Try hard and hard,
Put your effort enough,
Then see how your dreams may seem…….

One Question

One Question

A day comes, a day goes,
With happiness or sorrows,
A question arises in my mind,
What is our life and of what kind?

Is it to develop? Or is it to study?
Is it to be carefree or is it to worry?
What is it?
A puzzle or a game?
What is to gain?
Name or Fame?

Mysterious it is!
Is the only answer I find,
By going through world-
Round and round,
Uncountable things are to gain and do,
Uncountable things are enjoy to,

Still one question arises in my mind,
Who made the world so mysterious of kind!

मैं कहाँ कहाँ घूमा और कितनी राहों से गुज़रा ,
जी करता हैं मैं पतंग बन जाऊं और सारा जहान घूम आऊँ!

कितनी बड़ी है यह दुनिया और है यह सुन्दर धरा,
मैं हर डगर जाऊं और छुं लूँ वहाँ कि मिटटी,
जहां प्यासी है ज़मीन पानी के लिए,मैं ‘घनघोर’ बरस जाऊं,
शहर से दूर बस्ते हैं जो गाँव और जहां नहीं पहुंची है सड़क अभी,
कैसे जीतें है लोग वहाँ इस बात का पता लगाऊं,
जहां मुरझाएं हैं चेहरें और छीन गयी हैं खुशियाँ, वहाँ मैं ‘हरियाली’ ‘खुशहाली’ बन जाऊं!

समस्याओं की कमी नहीं हैं इस जहान में, और हैं कई बेबस और लाचार,
जी करता हैं कि मैं सबकी समस्याओंका समाधान बन जाऊं,
जहां जहां बस्ती है ऐसे इंसानों की बस्ती, मैं हर वोह जगह जाऊं,
उनके सपनोमें खो जाऊं, और उनकी उम्मीदों का दामन थाम लूँ,
मैं उनकी खुशी में झूम लूं और उदास हो जाऊं उनके दुःख में,
मैं सबकी पीडाओं को हर लूं और दारिद्र्य का विष प्राशन करनेवाला नीलकंठ बन जाऊं!

मैं काम आऊँ सदा औरोंके और नहीं बैठूं कभी चैन से,
न बनूँ बोझ कभी किसीपे, मदद करूँ हर जरूरतमंद की,
मैं हर बच्चे की मुस्कान बन जाऊं और सीने से लगा लूँ हर अनाथ को,
मैं चैन –ओ-अमन कि सृष्टि रचनेवाला विश्वकर्मा बन जाऊं,
प्यार करूँ सभी से मैं, रहूँ हमेशा हँसता और जिंदादिल हरदम,
करूँ माफ़ दुश्मन कि गलतियों को भी, और सुख का ‘श्राप’ देनेवाला ‘ऋषि ‘ बन जाऊं!

मैं कहाँ कहाँ घूमा और कितनी राहों से गुज़रा ,
जी करता हैं मैं पतंग बन जाऊं और सारा जहान घूम आऊँ ,
कितने हैं लोग ‘दुखी’ और ‘बेहाल’ इस जहांन में अभी,
मैं उन सबसे मिलूं और सबका हाल जानू ,
इंसानियत की बातें करूँ और आशा कि किरण जगाऊं,
मुझे इतना बड़ा बना दे हे इश्वर, की सबको अपनी बाँहों में समेट लूँ और साथ ले चलूँ सबको ,
मैं सबकी चिंताएं मिटानेवाली चिता बन जाऊं और पंचतत्व में विलीन हो जाऊं!

( मेरे स्वर्गवासी पूज्य ‘बाबा’ (पिताजी) जिनका दिनांक ०९.०१.२०११ को देहावसान हुआ, को समर्पित )

Dear Friends,

We have been constantly reading about rampant Corruption, Scams, and Fraud in our system. TV channels are flooded with latest updates and new’ discovery’ of’ unearthing’ of various ‘scams’ one after the other.

A chronological list of the ‘scams’ with details is already available in media. Catchy headlines such as ‘महा –घोटाला ’, ‘महा –महा घोटाला’ (and to be continued further), keep flashing on TV Channels and in print media.

Now, since ‘corruption’ has become a part of our life, I think we should legalize it and a ‘constitution’ like guidelines can also be implemented for corruption dividing it into ‘positive’ and ‘negative’ corruption. (I shall take it in details in a separate article).
Taking this positive approach and finding the new ‘opportunities’ in ‘corruption’  and thinking beyond the current level the following ‘inspirational’(?) thoughts came to mind.
We can take it further and add corruption to every sphere of our life(it has already reached there) and make applicable to other socio-economic-political –spiritual areas and promote it e.g. ‘excellence in corruption’, ‘awarding corrupt peoples’, film names-songs on corruption(in positive sense), books (best sellers on ‘corruption’), children’s games/toys, dolls, CD/DVD s etc.etc.

And I am confident, only ‘WE’ can develop an International standard on ‘being corrupt’.

Till then enjoy!

घोटालों से आगे………….
(एक भ्रष्टाचारी की आत्मगौरव कविता)

घोटालों से आगे जहान अभी और भी हैं,
भ्रष्टाचार की कहानी के किस्से अभी और भी हैं ,
कैसे कैसे डकारे हमने पब्लिक के करोड़ों रुपये ,
और ढूंढे नए नए नुस्खे पैसे कमाने के,
‘दास्ताँ-ऐ-बेईमानी ‘ तुम्हे सुनाना अभी और भी हैं,

जी चाहता हैं कि नित नए अनुसन्धान करतें रहें भ्रष्टाचार पर,
और करले पेटेन्ट अपनी कारगुजारियों का, ऐसें कि ,
कोई और न कर पाएं नक़ल हमारी बेईमानी की ,
‘आयाम’ दें ‘नए नए’ अपनी ‘काली करतूतों’ को हम,
इसमें असीमित संभावनाएं अभी और भी हैं,

घोटालों का रचें ऐसा इतिहास हम, के सदियों जहान में हों चर्चें हमारे,
और गर्व के साथ कह सके हम कि सबसे आगे होंगे हिन्दुस्तानी,
भ्रष्टाचार की न छोडें गुंजाईश किसी भी संस्था या उप संस्था में,
हर मक़ाम पे लहराएँ पताका हमारे काले कारनामोंकी,
रिश्वत और घूसखोरी की इस राह पर तमाम मंजिलें अभी और भी हैं,

‘गबन’ और ‘घपलों’ के तो राजा हैं हम और ‘एक्सपर्ट’ हैं इस ‘फिल्ड ‘ के,
हमसे बढ़कर कोई क्या बना पायेगा, बना जायेंगे इतने ‘कीर्तिमान’ हम,
अपनी ही तूती बोलेगी ‘रिश्वत’,’घोटालें’,’बेईमानी’ और ‘भ्रष्टाचार’ के क्षेत्र में,
‘गिनीज’ क्या, और ‘ओस्कर ‘ क्या, ‘नोबल’ भी होगा हमारे ही क़दमों में,
हम ही होंगे सबसे आगे और चोटी पर, यह विश्वास हर कदम आज भी हैं,

तुम तो ‘नालायक ‘ हो जो अपनाते नहीं अपने देश को,और तो और,
हर बात या ‘गंभीर समस्या‘ को भी टालते हो कहकर कि ‘अपने बाप का क्या जाता हैं ‘,
पर हम ऐसा नहीं करते, और चाटते हैं खूब गले लगाकर इस देश को इतना,
और लूटते हैं यह मानकर कि जो कुछ भी हैं सब अपने ही बाप का हैं,
जानते हैं हम कि तुम्हारे निठल्लेपन और लाचारी की हदें अभी और भी हैं,

हम तो जी भर कर करतें हैं प्यार इस देश की सम्पदा से इतना कि,
कर जाते हैं ‘व्यवस्था’ अपनी ‘सात’ ‘पुश्तों’ के लिए भी,
तुम तो  बस इसी तरह से देखते रहना तमाशा अपनी बर्बादी का,
और हाथ मलते रहना अपनी नाकामयाबी और नपुंसकता पर,
क्योंकि ऐ दोस्त तुम्हारे पास ‘मसलें’ इस ‘देश’ के सिवा ‘कई और’ भी हैं!

(यह गाथा आगे जारी हैं)

(a new beginning, a new hope)

Every day new thinking,
Every day a new thought

 Every day a new picture,
In mind to be caught

Every day a new way,
Thinking of many sorts

Every day a new day,
And things to enjoy a lot

Every day a new poem,
 A new story to write

Every day new lesson,
Gives us a new sight,

Every day brings different feelings,
Every day is of different kind

Every day is a mix of happiness and sorrow,
Every day is of new things to find and borrow